गीत तत्वों की दृष्टि से प्रसाद के गीतों का मूल्यांकन

 

बृजेन्द्र पाण्डेय

सहायक प्राध्यापक, मानव संसाधन विकास केन्द्र, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर

*Corresponding Author E-mail: brijpandey09@gmail.com

 

 

जीवन की बिखरी अनुभूतियों को समेट कर जब कवि उन्हें शब्द और अर्थ के माध्यम से एक कलापूर्ण रूप देता है तभी काव्य का जन्म होता है । ऐसा तभी होता है जब कवि अभिव्यक्ति के लिये व्यग्र हो उठता है । अनुभूत तथ्य का आनंद उसके हृदय में अटाएॅ नहीं अॅटता, वह कहने के लिये व्याकुल हो उठता है। उसकी इस व्यग्रता मंे अपनी अनुभूतियों को केवल व्यक्त भर कर देने की आकांक्षा नहीं होती, प्रत्युत पाठक तक पहुॅचा देने की, उन्हें एक सार्वभौम रूप देने की भावना भी उसके पीछे छिपी रहती है ।

    

प्रसाद जी भी मूलतः भावुक कवि हैं । अपने गीतों में उन्होंने अपनी भावनाओं को, अनुभूतियों को सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया है । कवि की अनुभूति अपनी अभिव्यक्ति का मार्ग स्वयं ढूंढ लेती है । उसके अन्तः स्थल में इन अनुभूतियों के फलस्वरूप जैसा स्वर गूंज उठता है, उसके अनुरूप ही उसकी अभिव्यक्ति होती है । अब हम यह देखेंगे कि प्रसाद जी ने अपने गीतों में विभिन्न गीत तत्वों का समावेश किस प्रकार किया है ।

 

(1)  संवेदनात्मक एकता:-

कवि का हृदय संवेदनाओं का भण्डार होता है । प्रसाद कवि भी अत्यधिक संवेदनशील हैं । उनमें हृदय की वेदना का भाव प्रचुर मात्रा में है। अपने प्रिय से बिछुड़ने के कारण उत्पन्न पीड़ा की अभिव्यक्ति वे अपने गीतों में करते हैं। प्रणय जीवन की स्मृतियाॅ कवि के मानस को आलोड़ित - विलोड़ित करती है । उसकी वेदना उसके हृदय में मचल - मचल उठती है, उसके आंसू नयन सदन के बाहर निकल पड़ते हैं और उसके करूणा कलित हृदय में विकल रागिनी बजकर आंसू के रूप में अवतरित होने लगती हैं । प्रसाद के गीतों में भावनाओं की छटपटाहट है-

 

मादक भी मोहमयी थी,

मन बहलाने की क्रीड़ा ।

अब हृदय हिला देती है,

मधुर पे्रम की पीड़ा ।

 

नन्द और यशोदा के कृष्ण की तरह प्रसाद का प्रिय उनसे दूर चला गया है । अब उन्हें मिलने की आशा नहीं है । इसलिये उनकी वेदना हाहाकार करके अनेकानेक स्वरों में गूंजने लगी है । भावनाओं की अकुलाहट, चित्त की विकलता और मन की असमर्थता से त्रस्त कवि निराशा के महासागर में ऊभ - चुभ लेने लगता है । उसे एक टीस, एक कसक, एक पीड़ा और एक ठेस लगती है । वह व्याकुल होकर इधर - उधर देखने लगता है, संवेदना और सहानुभूति चाहता है, अपनी दुःख भरी कहानी किसी के सामने दुहराना चाहता है । किन्तु लोग उसे देखकर अनदेखा कर देते हैं । सुनकर अनसुना मान लेते हैं और वह अनुभव करने लगता है -

 

बेसुध जो अपने सुख से,

जिनकी हैं सुप्त व्यधायें ।

अवकाश भला उनको कब है,

सुनने को पर करूण कथायों ।

 

चारों ओर से संकुल होकर कवि के मानस को वेदना घेर लेती है । वह उससे आक्रान्त हो उठता है । यह वेदना उसके लिए असह्य भी हो उठती है । किन्तु जब कवि जीवन और जगत की ओर व्यापक दृष्टि डालता है तो उसे पता चलता है कि वेदना की धूमिल छाया सर्वत्र व्याप्त है ं सन्ध्या और रजनी के पिछले पहरों में भी वह जलती ही रहती है, विश्व के कोने - कोने में विकल होकर भटकती रहती है तो वह अनुभव करता है कि आकाश - पाताल में विश्रान्ति न पाने वाली यह वेदना सामान्य वेदना नहीं है । वह यह मान लेता है कि सिर की रोली है उसकी उन्नति सूचिका और कर्म की प्रेरिका है । इसलिये वह कहता है कि यह वेदना निर्मम जगती को अपने उजाले से समाध करे -

 

निर्मम जगती को तेरा

मंगलगय मिले उजाला

इस जलते हुए हृदय की

कल्याणी शीतल ज्वाला ।

 

इससे स्पष्ट होता है कि प्रसाद जी ने अपने गीतों में अपनी समस्त संवेदनाओं को मुखरित कर दिया है ।

 

(2)  सहज उद्रेकता:-

प्रसाद जी के गीतों में भावनाओं का प्राधान्य रहता  है । पे्रम, विरह और सौन्दर्य आदि ही से सम्बन्धित कोमल पक्ष के गीतों के विषय होते हैं । प्रसाद जी के हृदय में भाव हिलोरे लेने लगता है । जब वह उद्धेलित हो उठता है तब बाहर फूट पड़ने के लिये मार्ग खोजने लगता है और जब वह अभिव्यक्त हो जाता है तभी गीत अत्यधिक भावमय, रसमय हो जाते हैं । प्रसाद ने अनेक गीत भावमय है और पाठक उसे पढ़कर भावुक हो उठते हैं-

निकल मत बाहर दुर्बल आह

लगेगा तुझे हंसी का शीत

शरद नीरद माला के बीच

तड़प ले चपली सी भयभीत ।

यह पारावार तरल हो,

फेनिल हो गरल उगलता

मथ डाला किस तृष्णा से

तल में बड़वालल जलता ।

 

प्रसाद वस्तुतः प्रेम में कवि थे । प्रेम को वे सर्वोच्च स्थान देते हैं । अपनी प्रियतमा से वे बेहद प्रेम करते थे । उनकी मृत्यु ने उन्हें बुरी तरह स्तम्भित कर दिया थ्ज्ञा । उनके हृदय में भावों का आलोड़न - विलोड़न होता है और वे पुकार उठते हैं कि उनका सारा हृदय कोलाहलपूर्ण, अशान्त और विक्षिप्त सा हो चुका है । अपनी प्रियतमा को खोजने के लिये वे उद्धेलित हो उठते हैं । कवि कहते हैं कि में तुम्हें खोजने के लिये धूल के कणों में जाकर बस जाऊंगा और उन्हें खोजने के लिये आकाश में ग्रह नक्षत्रों में जाने से भी नहीं डरते हैं, ताराओं से भी टकराने की हिम्मत वे रखते हैं । अपनी प्रिया से मिलन की आकांक्षा से ही वे ये गीत गुनगुना उठते हैं -

 

चमकूंगा धूल कणों में,

सौरभ हो उड़ जाऊँगा ।

पाऊॅगा कहीं तुम्हें तो,

ग्रह पथ में वकराऊंगा ।

 

यहाॅ कवि अपनी प्रिया से मिलने के लिये व्याकुल हो उठे हैं तो कभी वे अपने प्रेम को अपनी आहों में जागने को कहते हैं -

 

मेरी आहों में जागो,

सुस्मित में सोने वाले ।

अधरों से हॅसते - हॅसते

आॅखों से रोने वाले ।

 

प्रसाद ज अपनी प्रिया के विछोह में इतने दुःखी हो जाते हैं और जब उनका कहीं पता नहीं चलता, तब वे अपनी वेदना से ह पूछने लगते हैं । कहा भी जाता है कि जब व्यक्ति अत्यधिक दुखी और सम्तप्त हो जाता है तो वह स्वयमेव बातें करने लगता है और रोने की जगह हंसने लगता है । ठीक उसी तरह प्रसाद जी भी वेदने से कह उठते हैं -

 

बतला दो अरे न हिचको,

क्या देखा शूल्य गगन में ।

कितना पथ हो चल आयी

रजनी के मृदु निर्जन में ।

 

इस प्रकार प्रसाद जी के गीत सहज उद्रेकता की दृष्टि से भी सुन्दर बन पड़े हैं । उनके गीतों में सर्वत्र ही उनकी वेदना, पीड़ा और अपनी प्रियतमा की याद समायी हुई है ।

 

(3)  अनुभूति की गहनता:-

कवि के हृदय मंे अनुभूति की गहनता होती है और अनुभूति की तन्मयता में मालूम होता है कि कलाओं का स्वरूप भिन्न नहीं रह जाता । चित्रकार कवि बन जाता है, कवि चित्रकार । चित्रों में संगीत बह निकलता है । कल्पना भी संगीतपूर्ण हो उठती है । शब्द ही तूलिका बन ध्वनि फूठ पड़ती है, रंग गाने लगता है । यही कला का अन्तिम स्वरूप है जहां सौन्दर्य अंगों में नही शरीर आ विराजता है । मधुरिमा उसका गुण नहीं कलेवर बन जाती है । प्रसाद जी के गीतों में भी यह पाया जाता है ं पाठक भूल जाता है कि वह कविता पढ़ रहा है या चित्र देख रहा है अथवा संगीत के सम पर ही खड़ा है । उनके गीतों के सम पर ‘‘विश्व सिर हिला देता     है ।‘‘ उनके चित्रों के सौन्दर्य पर दृष्टि अचल हो जाती है, उनके काव्य के भाव में मन विभोर हो जाता है, पार्थिकता दूर बहुत पीछे रह जाती है । सुवासिनी, संगीत सौन्दर्य प्रेम की मूर्ति, गाने लगती है -

 

तुम कनक किरण के अन्तराल में

लुक छिप कर चलते हो क्यो ।

 

अनुभूति की तीव्रता की दृष्टि से प्रसाद जी के गीत बहुत सुन्दर बन पड़े है । प्रथम ही हृदय मंे बजती हुई विकल रागिनी की ओर संकेत दे देता है । धीरे - धीरे उसका वेदनामय हृृदय खुलने लगता है और जब वेदना घनीभूत रूप धारण कर लेती है तब वह देखता है कि उसमें वेदना समग्र सृष्टि में व्याप्त हो गयी है, तब उसके दुःखमय मनोवेग अपने उच्चतम मानसिक स्तर पर पहुंच विचारों के साथ मिलकर अत्यन्त तीव्र हो उटते हैं । परस्पर संघर्ष होता है और भावों का विचारों के संयोग से संतुलन हो जाता है । वेदनापूर्ण मनोवेग जो अपने चरम पर पहुंच कर दार्शनिकता में परिणत हो इस रूप में निकल पड़ते हैं -

 

प्रत्यावर्तन के पथ पर

अवशेष न चिन्ह रहा है

डूबा है हृदय मरूस्थल

आंसू नद उमड़ रहा है ।

 

कवि अपने प्रियतमा की याद में छटपटाते रहते हैं । उसके रूप का, यौवन का औश्र उसके साथ व्यतीत किये पलों की याद कर करके अपनी जीवन व्यतीत करते हैं । उनकी अनुभूति के तीव्र होने से उनके हृदय के भाव स्वतः ही उन गीतों के रूप में फूट पड़तें हैं -

 

हिलते दुम दल कल किसलय

देती गलबाही डाली

फूलों का चुम्बन छिड़ती,

मधुपों की तान निराली ।

 

वे यह याद करते हैं कि संयोग के दिनों में, अर्थात् मेरे प्रणय जीवन में जो सरसता और सुकुमारता अथवा मनोरमता थी हव प्राकृतिक वातावरण के कारण कई गुना बढ़ जाया करती थी, ऐसे मादक वातावरण में वे अपनी प्रियतमा के साथ बिताते थे । उनका हृदय अनुभूतियों का भण्डार था ।

 

(4)  आत्मनिष्ठा:-

कवि के हृदय में जब भावनायें उद्धेलित होती हैं तो वह उन्हें किसी भी माध्यम से प्रकट करना चाहता  है । अपनी इस अनुभूति को वह दूसरों तक पहुचाना भी चाहता है ताकि दूसरे भी इसका आनन्द उठा सकें । अतः भावनाओं के आवेश में वह जो भी कविता रचता है उसमें केवल उसकी ही भावनायें प्रश्रय पाती है । अतः गीतिकाव्य में कवि की अनुभूतियों का प्राधान्य रहता है । प्रसाद के गीत तो स्वतः उनके हृदय से निकलते हैं । वे बहुत ही भावुक कवि हैं । अपनी प्रियतमा से बिछड़ते ही उनके हृदय में दुख की काली घटायें छाने लगीं । कहा भी तो जाता है कि जब अपना मन खुश नहीं रहता तो कुछ भी अच्छा नहीं लगता । उसी तरह प्रसाद जी के हृदय में विषाद, निराशा छायी हुई है । अतः उन्हें सर्वत्र प्रकृति भी दुखी, निराशा दिखाई देती है । तभी तो वे कह उठते हैं-

 

बुलबुले सिन्धु के फूटे,

नक्षत्र मलिका टूटी

नभ मुक्त कुन्तला धरणी,

दिखलाईदेती लूटी ।

 

प्रसाद जी दुख की अधिकता के कारण अपनी प्रियतमा के विछोह में सर्वत्र परेशान से घूमते रहते हैं । कभी तो वे प्रकृति से अपनी प्रियतमा के बारे में पूछते हैं तो कभी किसी से । उनकी प्रकृति भी उनकी बात बड़ी ध्यान से सुनती है और उनका उत्तर भी देती है । उनकी ही तरह किसी का पवित्र स्पर्श भी देती हैं और उनकी दुःख भरी कहानी को पूरी सहानुभूति और संवेदना के साथ सुनती भी है । इसलिये कहीं पर कोई बौना जलनिधि शशि को छूने की ललक दिखाता है तो कहीं संसार की स्वार्थपरायण वृत्ति का एक चित्र यों व्यक्त हुआ है -

 

कलियों को उन्मुख देखा,

सुनते वह कपट कहानी ।

फिर देखा उड़ जाते भी,

मधुकर को कर मनमानी ।

 

प्रसाद जी को सर्वत्र अपने भाव ही दृष्टिगोचर होते हैं । वह अपनी भी भावनायें व्यक्त करता है । प्रसाद के हृदय में अपनी प्रियतमा को लेकर अभिलाषाओं की जो करवट उठती है उसके कारण उसकी सोयी हुई व्यथा जाग जाती है और तब -

 

अभिलाषाओं की करवट,

फिर सुप्त व्यथा का जगना ।

सुख का सपना हो जाना,

भीगी पलकों का लगना ।

 

आंखों का रोना स्वाभाविक ही है । जहां उसके जीवन में दुख के तिनके तक दिखाई न पड़ते थे, सुख का सागर इस भांति लहराता था कि वह अंतरिक्ष औश्र जल, थल में भी न समाता था -

 

इतना सुख जो न समाता

अंतरिक्ष में या जल थल मंे ।

वहीं उसके हृदय में अब निराशा और अवसाद की धूल उड़ने लगी है । मादकता से आने वाला प्रियतम संज्ञा की भांति उसके जीवन से जा चुका है । इसलिये अब उसके नेत्रों से आंसू मरन्द गिरता है, मुख से आहें निकलती हैं और वह प्रात धूल में पड़ा मिलता है । उसके हृदय की जो कोमल भावनायें थी, वे अब छाले के रूप में बदलकर प्रिया की निष्ठुरता के चरणों द्वारा बुरी तरह रगड़े जाकर आंसू का रूप धारण कर चुके हैं । सूखे झाड़ों क नीरस्ता के कारण उसकी खिन्नता और बढ़ उठी है, उसके हृदय की फुलवारी सूख गई है । तभी तो वे अपनी प्रिया से कहते हैं अपने मन के भाव, अपने गीतों के रूप में -

 

मादकता से आये तुम,

संज्ञा से चले गये ।

हम व्याकुल पड़े बिलखते,

उतरे हूए नशे से ।

 

संदर्भ ग्रन्थ सूचीः-

01.  जयश्ंाकर प्रसाद, तितली नई दिल्लीःवाणी प्रकाशन-2007

02.  दिनेश कुमार गुप्त, पाश्चात्य नाट्य दृष्टि और जयश्ंाकर प्रसाद के नाटक, ईशा ज्ञानदीप प्रकाशनः नई दिल्ली- प्रथम संस्करणः 2002

03. प्रभाकर श्रोत्रिय, प्रसाद साहित्य मे प्रेम तत्व, नई दिल्लीः नेशनल पब्लिशिंग हाउस प्रथम संस्करण-2000

04. डाॅ. प्रेमश्ंाकर, प्रसाद के काव्य, इलाहाबाद: भारती भंडार, त्रतीय संस्करण,1970

05. डाॅ. नागेन्द्र हिन्दी साहित्य का इतिहासराजकमल प्रकाशन मयूर पेपरबैक्स ए-95,सेक्टर 05,नोएडा, चांैतीसवंा संस्करण-2007

06. जयशंकर प्रसाद, कामायनी, लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण-2002

07. जयशंकर प्रसाद, स्कंदगुप्त, लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण-2002

08. डाॅ. गंगा सहायप्रेमी, जयशंकर प्रसाद एक विशेष अध्ययन-आगरा- हरीश प्रकाशन

09. शेर सिंह का समर्पण- जयश्ंाकर प्रसाद

10. जागो फिर एक बार सूर्यकान्त त्रिपाठी निरालापृष्ठ क्र. 15

11. आंसू- जयशंकर प्रसाद

12.आधुनिक कवि“- महादेवी वर्मा पृष्ठ क्र. 202

13. अपरा सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला पृष्ठ क्र. 12

14. लहर जयश्ंार प्रसाद- पृष्ठ क्र. 19

15. कामायनी जयश्ंार प्रसाद- पृष्ठ क्र. 25

 

 

 

Received on 19.07.2015       Modified on 11.08.2015

Accepted on 30.08.2015      © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences 3(3): July- Sept., 2015; Page 103-106